पटना:- गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर 14 जनवरी को मकर संक्रांति स्नान पर्व के साथ दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ‘माघ मेला’ में आदिकाल से चली आ रही कल्पवास की परंपरा का नर्विहन किया जायेगा। तीर्थराज प्रयाग में संगम तट पर पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ होकर माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है। मिथिलावासी मकर संक्रांति से अगली माघी संक्रांति तक कल्पवास करते हैं। इस परंपरा का नर्विहन करने वाले मुख्यत: बिहार और झारखंड के मैथिल्य ब्राह्मण होते हैं जिनकी संख्या बहुत कम होती है। पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु कल्पवास करते हैं। वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतष्ठिान कर्मकाण्ड प्रशक्षिण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा आत्माराम गौतम ने कहा कि पुराणों और धर्मशास्त्रों में कल्पवास को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए आध्यात्म की राह का एक पड़ाव है, जिसके जरिए स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है। हर वर्ष कल्पवासी एक महीने तक संगम गंगा तट पर अल्पाहार, स्नान, ध्यान एवं दान करते है। देश के कोने कोने से आये श्रद्धालु संगम तीरे शिविर में रहकर माह भर भजन-कीर्तन शुरू करेंगे और मोक्ष की आस के साथ संतों के सानध्यि में समय व्यतीत करेंगे। सुख-सुविधाओं का त्याग करके दिन में एक बार भोजन और तीन बार गंगा स्नान करके कल्पवासी तपस्वी का जीवन व्यतीत करेंगे। बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु कड़ाके की सर्दी में कम से कम संसाधनों की सहायता लेकर कल्पवास करते हैं।

एक रात्रि से वर्ष तक चलता है कल्पवास:

आचार्य गौतम ने बताया कि संगम तट पर कल्पवास का खास महत्व है। कल्पवास का जक्रि वेदों और पुराणों में भी मिलता है। कल्पवास एक बहुत ही मुश्किल साधना है क्योंकि इसमें तमाम तरह के नियंत्रण और संयम का अभ्यस्त होने की जरूरत होती है। कल्पवासी को संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, परनन्दिा त्याग, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना कहा गया है। कल्पवास में ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग, दान का अधिक महत्व होता है। एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर सोना पड़ता है. इस दौरान श्रद्धालु फलाहार, एक समय का अल्पाहार या निराहार रहते हैं। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमपूर्वक तीन समय गंगा स्नान और यथासंभव भजन-कीर्तन, प्रभु चर्चा और प्रभु लीला का दर्शन करना चाहिए। कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि की भी है। बहुत से श्रद्धालु जीवन भर माघ मास गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं। विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है।

प्रयागवाल महासभा के महामंत्री राजेन्द्र पालीवाल ने बताया कि प्रयागवाल ही कल्पवासियों को बसाता है। कल्पवास की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। तीर्थराज प्रयाग में संगम के निकट पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ होता है और माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है। पौष पूर्णिमा के साथ आरंभ करने वाले श्रद्धालु एक महीने वहीं बसते हैं और भजन-ध्यान आदि करते हैं। कल्पवास मनुष्य के लिए आध्यात्मिक विकास का जरिया है। संगम पर माघ के पूरे महीने निवास कर पुण्य फल प्राप्त करने की इस साधना को कल्पवास कहा जाता है। मान्यता है कि प्रयाग में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के कल्पवास से एक कल्प का पुण्य मिलता है। उन्होने बताया कि कल्पवास की शुरुआत के पहले दिन तुलसी और शालग्रिाम की स्थापना और पूजन करते हैं। कल्पवासी अपने शिविर के बाहर जौ का बिरवा रोपित करते हैं। कल्पवास की समाप्ति पर इस पौधे को कल्पवासी अपने साथ ले जाते है जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।    

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